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Chapter 1 - chapter 1 - the blue screen

मेरा नाम सोनम है।

और मैं इस कहानी की मुख्य पात्र हूँ।

मैं दिल्ली के एक हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक साधारण छात्रा हूँ। कम से कम बाहर से देखने पर तो मैं साधारण ही लगती हूँ।

लेकिन मेरे पास एक ऐसा रहस्य है जिसके बारे में दुनिया में कोई नहीं जानता।

एक नीली स्क्रीन।

हाँ, बिल्कुल वैसी ही जैसी किसी गेम में दिखाई देती है।

यह स्क्रीन मुझे तब से दिखाई देती है जब मैं पैदा हुई थी... या कम से कम मेरी सबसे पुरानी यादों में यह हमेशा मौजूद रही है।

जब मैं बहुत छोटी थी, तब मैं लोगों से पूछती थी,

"क्या आपको भी यह नीली स्क्रीन दिखाई दे रही है?"

लेकिन हर बार मुझे अजीब नज़रों से देखा जाता।

कुछ लोग हँसते।

कुछ कहते,

"यह लड़की बहुत कल्पनाएँ करती है।"

और कुछ तो मुझे पागल तक समझने लगे।

धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि यह स्क्रीन सिर्फ मुझे ही दिखाई देती है।

समय बीतता गया।

एक साल...

पाँच साल...

दस साल...

अठारह साल...

लेकिन वह स्क्रीन कभी गायब नहीं हुई।

वह हमेशा मेरे सामने रहती थी, पर कभी कोई काम नहीं करती थी।

मानो किसी मशीन का स्विच ऑन होना बाकी हो।

और फिर...

आज।

मेरे अठारहवें जन्मदिन के कुछ दिनों बाद।

वह अचानक सक्रिय हो गई।

लेकिन उससे पहले मैं अपनी कहानी बताना चाहती हूँ।

क्योंकि किसी भी इंसान की कहानी उसकी परेशानियों से शुरू नहीं होती।

उसकी कहानी उसके बचपन से शुरू होती है।

जब मैं छोटी थी और पालने में लेटी रहती थी, तब आस-पड़ोस की आंटियाँ मुझे देखकर कहा करती थीं—

"यह बड़ी होकर कलेक्टर बनेगी।"

"नहीं-नहीं, यह तो पुलिस अफसर बनेगी।"

"इतनी प्यारी बच्ची है, IIT निकालेगी।"

उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आता था।

लेकिन अब सोचती हूँ...

कितना अजीब है।

हमारा भविष्य अक्सर हमारे हाथों में आने से पहले ही तय कर दिया जाता है।

जैसे हम इंसान नहीं, कोई प्रोजेक्ट हों।

शुरुआत में सब मज़ाक जैसा लगता है।

फिर धीरे-धीरे पढ़ाई का दबाव बढ़ने लगता है।

फिर तुलना शुरू होती है।

फिर नंबरों की दौड़।

फिर दूसरों से आगे निकलने की होड़।

और देखते ही देखते बचपन कहीं खो जाता है।

मैं पढ़ाई में कभी बहुत तेज नहीं थी।

लेकिन मैं मेहनती थी।

शायद इसी वजह से समय के साथ मुझे पढ़ाई में रुचि आने लगी।

मेरी ज़िंदगी धीरे-धीरे सही दिशा में जा रही थी।

कम से कम मुझे ऐसा ही लगता था।

लेकिन शायद ज़िंदगी को मेरी खुशी पसंद नहीं थी।

क्योंकि असली मुसीबत अभी शुरू भी नहीं हुई थी।

दसवीं कक्षा पास करने के बाद मैंने अपना पुराना स्कूल छोड़ दिया।

मैंने ट्रांसफर सर्टिफिकेट लिया और दिल्ली के एक बड़े प्राइवेट स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला ले लिया।

मैंने बायोलॉजी स्ट्रीम चुनी थी।

उस दिन मुझे लगा था कि मेरी नई शुरुआत होने वाली है।

नए दोस्त।

नया माहौल।

नए सपने।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि उसी स्कूल के दरवाज़े के पीछे मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दौर मेरा इंतज़ार कर रहा था।

वहीं से शुरू हुई...

मेरी बुलिंग की कहानी।

Chapter 1 end.

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